उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab subh-e-masarrat thi hote na the hum tanha

जब सुब्ह-ए-मसर्रत थी होते न थे हम तन्हा

جب صبح مسرت تھی ہوتے نہ تھے ہم تنہا

शायर: Hafeez Ansari6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब सुब्ह-ए-मसर्रत थी होते न थे हम तन्हा
अब अपनी गुज़रती है हर शाम-ए-अलम तन्हा

तुम ने भी न समझा था हम ने भी न सोचा था
ऐसे भी दिन आएँगे रह जाएँगे हम तन्हा

लाई है जहाँ तक भी तुम को मिरी हम-राही
चल कर तो ज़रा देखो दो चार क़दम तन्हा

ज़रदार भी तेरे ही बंदे हैं तो फिर या-रब
मुफ़्लिस ही फ़क़त झेलें क्यों रंज-ओ-अलम तन्हा

इल्हाद की तारीकी सौ रूप भी धारे तो
ज़ुल्मात पे भारी है इक शम’-ए-हरम तन्हा

गुफ़्तार के ग़ाज़ी तो ता'दाद में लाखों थे
लेकिन ये हक़ीक़त है थे दार पे हम तन्हा