उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab KHak uData hua nindon ka safar ho

जब ख़ाक उड़ाता हुआ नींदों का सफ़र हो

جب خاک اڑاتا ہوا نیندوں کا سفر ہو

शायर: Faisal Hashmi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब ख़ाक उड़ाता हुआ नींदों का सफ़र हो
फिर क्यों न किसी और ही दुनिया से गुज़र हो

वो मेरे बराबर से निकल आया था वर्ना
दीवार न थी ऐसी कि जिस में कोई दर हो

मैं जिस्म से गुज़रा हूँ यही सोच के अक्सर
शायद कि तिरी रूह का इस राह में घर हो

ये कैसी तमन्ना है कि इस दश्त में 'फ़ैसल'
दरिया हो किनारा हो सफ़ीना हो भँवर हो