उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab bhi hanste hue inkar kiya hai usne

जब भी हँसते हुए इंकार किया है उस ने

جب بھی ہنستے ہوئے انکار کیا ہے اس نے

शायर: Faheem Jogapuri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब भी हँसते हुए इंकार किया है उस ने
दिल पे इक और नया वार किया है उस ने

उस को नफ़रत की निगाहों से न देखे कोई
उम्र भर ख़ुद को बहुत प्यार किया है उस ने

चूमना उस को सलीक़े से ज़रा बाद-ए-सबा
वरक़-ए-गुल को भी तलवार किया है उस ने

धूप आवाज़ दे तो छाँव पुकारे उस को
कितने आलम को गिरफ़्तार किया है उस ने

क्या कभी शम-ए-फ़रोज़ाँ से किसी ने पूछा
कैसे इक सुब्ह का दीदार किया है उस ने