उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jaan ise chalane mein ahrman ki khapti hai

जान इसे चलाने में अहरमन की खपती है

جان اسے چلانے میں اہرمن کی کھپتی ہے

शायर: Umang Bali6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जान इसे चलाने में अहरमन की खपती है
रात-दिन मगर दुनिया नाम तेरा जपती है

रौशनी के जल्वे हैं फलते फूलते जंगल
जिन की छत्रछाया में तीरगी पनपती है

गूँज सी यहाँ शब-भर तुम जो रोज़ सुनते हो
दश्त की पनाहों में ख़ामुशी तड़पती है

क्या कहा कहो तो फिर ध्यान हुस्न सीरत का
ऐ मियाँ मिरी मानो छाप लो जो छपती है

ना-गहाँ मगर इस में फूल क्यूँ नहीं खिलते
रेग-ज़ार की मानिंद ख़ाक-ए-दिल भी तपती है

हुस्न उतर के आता है यूँ 'उमंग' आँखों में
झील जिस तरह गहरी रौशनी हड़पती है