उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is tarah pahle to ghar se main kabhi nikla na tha

इस तरह पहले तो घर से मैं कभी निकला न था

اس طرح پہلے تو گھر سے مَیں کبھی نکلا نہ تھا

शायर: Ehsan Razaa5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस तरह पहले तो घर से मैं कभी निकला न था
धूप थी चारों तरफ़ मेरे कहीं साया न था

मैं ठिठुर कर रह गया हूँ सर्द मौसम के तले
वर्ना जंगल में शजर मुझ से कोई ऊँचा न था

सच तो ये है दोस्तों को मुस्कुराहट थी पसंद
शिद्दत-ए-रंज-ओ-अलम में इस लिए रोया न था

पेश कोई हादिसा आया कि मंज़िल आ गई
दिल अचानक राह में ऐसे कभी धड़का न था

घूमती है अपने मरकज़ पर सुना तो है 'रज़ा'
हम ने दुनिया को अलग हो कर कभी देखा न था