उर्दू शायरी · ग़ज़ल

intizar-e-did mein yun aankh pathrai ki bas

इंतिज़ार-ए-दीद में यूँ आँख पथराई कि बस

انتظار دید میں یوں آنکھ پتھرائی کہ بس

शायर: Gawwas Qureshi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इंतिज़ार-ए-दीद में यूँ आँख पथराई कि बस
मरते मरते वो हुई आलम में रुस्वाई कि बस

देख कर शबनम की हालत हँस पड़ी नौ-रस-कली
दो-घड़ी पत्तों पे रह कर इतना इतराई कि बस

दिल की धड़कन बढ़ गई आँखों में आँसू आ गए
इक ज़रा सी बात पर इतनी हँसी आई कि बस

मौत को भी मरने वाले पर तरस आ ही गया
इस तरह चढ़ती जवानी में क़ज़ा आई कि बस

बात कैसी अब तो होंटों पर है आहों का हुजूम
चोट खाने पर भी ऐसी चोट पर खाई कि बस

तौबा करने को तो कर ली हज़रत-ए-'ग़व्वास' ने
यक-ब-यक गर्दूं पे वो काली घटा छाई कि बस