उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek KHwab mujassam hone se viran hua

इक ख़्वाब मुजस्सम होने से वीरान हुआ

اک خواب مجسم ہونے سے ویران ہوا

शायर: Lateef Sahil7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक ख़्वाब मुजस्सम होने से वीरान हुआ
इक जुगनू हाथ में आया तो बे-जान हुआ

इक पेड़ पे आए फल तो परिंदे मिल बैठे
इक शख़्स का बचपन बीता तो अंजान हुआ

इक देखने वाला देख चुका जब आँखों में
फिर दिल में अन-देखे का डर मेहमान हुआ

वो एक सफ़र ईजाद का था या हिजरत थी
जो रस्ता शहर से निकला इक मैदान हुआ

मैं राख हुआ तो सोग की कोई बात नहीं
इस ख़ाक पे मेरे वस्ल का दिन आसान हुआ

कुछ पौदों तक इक दिन भी धूप ना आई थी
इक पेड़ के कटने से जंगल गुंजान हुआ

इक ख़्वाब से जैसे सौ ता'बीरें निकली हों
इक चेहरा कितने चेहरों की पहचान हुआ