उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hawa se ujaD kar bikhar kyun gae

हवा से उजड़ कर बिखर क्यूँ गए

ہوا سے اجڑ کر بکھر کیوں گئے

शायर: Parkash Fikri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हवा से उजड़ कर बिखर क्यूँ गए
वो पत्ते जो सरसब्ज़ शाख़ों पे थे

हरी घास किस के लहू से जली
वो तितली के रंगीन पर क्या हुए

नहीं कोई चिड़िया किसी डाल पर
दरख़्तों पे मकड़ी ने जाले बुने

दरीचों के शीशों का दिल तोड़ कर
मकाँ ख़ाली रूहों के मस्कन बने

है ख़बरों के चेहरों पे वहशत बहुत
मैं देखूँ जो उन को मिरा जी डरे

जो आँखों की 'फ़िक्री' हँसी छीन लें
वो किस तीरा जंगल के हैं भेड़िये