उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hai nok-e-Khaar mein kuchh wo to sabza-zar mein kuchh

है नोक-ए-ख़ार में कुछ वो तो सब्ज़ा-ज़ार में कुछ

ہے نوک خار میں کچھ وہ تو سبزہ زار میں کچھ

शायर: Jai Prakash Ghafil7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

है नोक-ए-ख़ार में कुछ वो तो सब्ज़ा-ज़ार में कुछ
ख़िज़ाँ में कुछ है मगर मौसम-ए-बहार में कुछ

गुहर था माह था जुगनू था या सितारा-ए-शाम
चमक रहा था तिरी चश्म-ए-अश्क-बार में कुछ

कहाँ के वहम-ओ-गुमाँ का है सिलसिला मिरी ज़ीस्त
कि उस के पार ही कुछ है न इस हिसार में कुछ

तमाम-उम्र वही मिस्ल-ए-ख़ार चुभते रहे
गुज़र गए थे जो पल साया-ए-बहार में कुछ

फिर इस के बा'द है ख़ुद पर यक़ीं न दुनिया पर
थी ऐसी बात ही इक पल के ए'तिबार में कुछ

मैं उस की याद से दामन छुड़ा लूँ मुझ को ख़याल
तब आया जब न रहा मेरे इख़्तियार में कुछ

न चाहता वो तो रौशन न होती कोई भी शय
है नूर उस का भी क्या शाम-ए-इंतिज़ार में कुछ