उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hathon ko bana deti hai jab barg-e-hina surKH

हाथों को बना देती है जब बर्ग-ए-हिना सुर्ख़

ہاتھوں کو بنا دیتی ہے جب برگ حنا سرخ

शायर: Kaleem Yazdani5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हाथों को बना देती है जब बर्ग-ए-हिना सुर्ख़
कर देती है रुख़्सार को फिर शर्म-ओ-हया सुर्ख़

तारीकियाँ ज़ाइल हों तो हो जाए सवेरा
फैले जो शफ़क़ चार सू हो जाए फ़ज़ा सुर्ख़

शायद कि बरसने को है फिर आग फ़लक से
क्यों आज नज़र आने लगी है ये घटा सुर्ख़

हम होंगे शहीदान-ए-वफ़ा क्यों न जहाँ में
मल्बूस हमारे लिए है जब कि बना सुर्ख़

फिर आज सुलगता है मकाँ शहर में कोई
वो दूर उफ़ुक़ पर जो नज़र आई ज़िया सुर्ख़