उर्दू शायरी · ग़ज़ल

guzre tamam umr ajab imtihan se hum

गुज़रे तमाम उम्र अजब इम्तिहाँ से हम

گزرے تمام عمر عجب امتحاں سے ہم

शायर: Faheem Jogapuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुज़रे तमाम उम्र अजब इम्तिहाँ से हम
उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम

इस आइने को मौसम-ए-गुल की तलाश है
अहद-ए-शबाब ढूँड के लाएँ कहाँ से हम

जैसे वो आसमान ही मुट्ठी में आ गया
थे इतना ख़ुश-गुमान किसी बद-गुमाँ से हम

आवारगी-ए-शौक़ में सूद-ओ-ज़ियाँ है क्या
ये कारोबार सीख रहे हैं धुआँ से हम

तन्क़ीद कर रहे हैं उसी की ज़बान पर
अल्फ़ाज़ ले के आए हैं जिस दास्ताँ से हम

जो निगह-ए-इंतिख़ाब के क़ाबिल न था कभी
आँखें लड़ाने बैठ गए उस जहाँ से हम

इक़रार को बना गए इंकार वो 'फहीम'
कहते थे जो पलटते नहीं हैं बयाँ से हम