उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ganj-e-maKHfi se dilon ko ba-KHabar karta hua

गंज-ए-मख़्फ़ी से दिलों को बा-ख़बर करता हुआ

گنج مخفی سے دلوں کو باخبر کرتا ہوا

शायर: Taj Adil6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गंज-ए-मख़्फ़ी से दिलों को बा-ख़बर करता हुआ
इक तजस्सुस ज़ात के अंदर सफ़र करता हुआ

इक सदा पे मुंजमिद होती हुई सब साअ'तें
एक लम्हा ज़िंदगी को मुख़्तसर करता हुआ

इक ज़रा सी बात पर मंज़र धुआँ होते हुए
इक ज़रा सा ज़हर बस्ती को खंडर करता हुआ

सब्ज़ लम्हे वक़्त की नम आँख से गिरते हुए
ज़र्द मौसम मंज़रों को बे-समर करता हुआ

किस का रिश्ता टूट कर बिखरा है मेरी आँख में
कौन है ये ज़ख़्म सा सीने में घर करता हुआ

मेरे अंदर लम्हा लम्हा डूबती इक काएनात
'ताज' कोई नक़्श है दिल में भँवर करता हुआ