उर्दू शायरी · ग़ज़ल

diwar iKHtilaf ki itni buland hai

दीवार इख़्तिलाफ़ की इतनी बुलंद है

دیوار اختلاف کی اتنی بلند ہے

शायर: Ghail Fareedi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दीवार इख़्तिलाफ़ की इतनी बुलंद है
रस्मन भी अब सलाम-ओ-दुआ उन से बंद है

सच बात कह के सब की नज़र से हुए हैं दूर
थी कब ख़बर ज़माना ख़ुशामद-पसंद है

वाक़िफ़ नहीं ज़माने की हक़ बात से जो शख़्स
दुनिया समझ रही है उसे होश-मंद है

इक दर पे सर झुका के ये इज़्ज़त मिली मुझे
दुनिया के सामने मिरा अब सर बुलंद है

साबित क़दम रहोगे मोहब्बत में अह्द है
या सिर्फ़ ये मुआहिदा-ए-ताशक़ंद है

‘घाइल’ तुम्हारे बारे में कहते हैं अब भी लोग
हैं ख़ामियाँ बहुत मगर अख़्लाक़-मंद है