उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dhundlahaTon mein gum the jo manzar chamak gae

धुंदलाहटों में गुम थे जो मंज़र चमक गए

دھندلاھٹوں میں گم تھے جو منظر چمک گئے

शायर: Zafar Sahbai6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

धुंदलाहटों में गुम थे जो मंज़र चमक गए
मेरी नज़र से कितने ही पर्दे सरक गए

इस साया-ए-बदन में ठहर जाएँ अब तो हम
बे-नाम मंज़िलों के तजस्सुस में थक गए

ये किस के ग़म की आँच से पिघला है संग-ए-दिल
आँखों से मेरी आज फिर आँसू टपक गए

ख़ुद को तलाश कर कि हैं तुझ में हक़ीक़तें
उन की तरफ़ न देख जो सू-ए-फ़लक गए

काँटों की फ़स्ल है मिरी राहों का पैरहन
वो रास्ते किधर हैं जो फूलों से ढक गए

उजड़े बदन सँवर न सके यूँ तो दोस्तो
बाग़ों में रुत जवान हुई फल भी पक गए