उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chashm-e-tar pe naqsh hai un manzaron ka silsila

चश्म-ए-तर पे नक़्श है उन मंज़रों का सिलसिला

چشم تر پہ نقش ہے ان منظروں کا سلسلہ

शायर: Yasmin Barkat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चश्म-ए-तर पे नक़्श है उन मंज़रों का सिलसिला
बढ़ते बढ़ते बढ़ गया है फ़ासलों का सिलसिला

हम सलामत किस तरह रहते भला सच बोल कर
चार-सू बिखरा पड़ा था पत्थरों का सिलसिला

दिल की वहशत माँगती है ला-मकाँ की वुसअ'तें
इक नज़र भाता नहीं मुझ को घरों का सिलसिला

नींद का एहसास रौशन क़ुमक़ुमों में खो गया
आ बसा आँखों में मेरे रतजगों का सिलसिला

वो अना के ख़ोल में था मैं अना से दूर थी
मेरे उस के दरमियाँ था उलझनों का सिलसिला

क्यों नज़र आती नहीं लोगों को अपनी सूरतें
दूर तक फैला है जबकि आइनों का सिलसिला

'यासमीं' जिन से मयस्सर हो तरावत आँख को
देखना है अब मुझे ऐसी रुतों का सिलसिला