उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chand ubhra na mere jism se saya nikla

चाँद उभरा न मिरे जिस्म से साया निकला

چاند ابھرا نہ مرے جسم سے سایا نکلا

शायर: Kaif Ansari6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाँद उभरा न मिरे जिस्म से साया निकला
शाम-ए-ग़म आई तो मैं घर से अकेला निकला

आज आया है दरीचे पे हवा का झोंका
आज कोई तो मुझे देखने वाला निकला

ये अलग बात कि खुलने लगे पलकों के वरक़
नोक-ए-लब से न कभी हर्फ़-ए-तमन्ना निकला

हो गए और दर-ओ-बाम नज़र से ओझल
दर-हक़ीक़त ये उजाला भी अँधेरा निकला

कोई आवाज़ तो आ जाती कहीं से वापस
ये कुआँ घर का तो इतना भी न गहरा निकला

लौट जा अब मिरी आँखों में नहीं हैं आँसू
तू समुंदर जिसे समझा था वो सहरा निकला