उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bijli giri to soch ke sab tar kaT gae

बिजली गिरी तो सोच के सब तार कट गए

بجلی گری تو سوچ کے سب تار کٹ گئے

शायर: Ghani Ejaz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बिजली गिरी तो सोच के सब तार कट गए
यक-लख़्त रौशनी से अंधेरे लिपट गए

सहरा-नवर्दियों में तो महफ़ूज़ थे मगर
शहरों के आस-पास ही खे़मे उलट गए

मिलने को चंद रोज़ मिले थे सुकून के
दिन अपनी उम्र के तो बहर-हाल घट गए

साए कि फैलते ही चले थे ज़मीन पर
सूरज ने जूँही आँख दिखाई सिमट गए

अंजाम-ए-कार ख़ुद ही शिकारी थे जाल में
'एजाज़' अहल-ए-जौर के पाँसे पलट गए