उर्दू शायरी · ग़ज़ल

be-chehragi-e-umr KHajalat bhi bahut hai

बे-चेहरगी-ए-उम्र ख़जालत भी बहुत है

بے چہرگیٔ عمر خجالت بھی بہت ہے

शायर: Ghazanfar Hashmi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बे-चेहरगी-ए-उम्र ख़जालत भी बहुत है
इस दश्त में गिर्दाब की सूरत भी बहुत है

आँखें जो लिए फिरता हूँ ऐ ख़्वाब मुसलसल
मेरे लिए ये कार-ए-अज़िय्यत भी बहुत है

तुम ज़ाद-ए-सफ़र इतना उठाओगे कहाँ तक
अस्बाब में इक रंज-ए-मसाफ़त भी बहुत है

दो साँस भी हो जाएँ बहम हब्स-ए-बदन में
ऐ 'उम्र-ए-रवाँ इतनी करामत भी बहुत है

कुछ उजरत-ए-हस्ती भी नहीं अपने मुताबिक़
कुछ कार-ए-तनफ़्फ़ुस में मशक़्क़त भी बहुत है

अब मौत मुझे मार के क्या देगी 'ग़ज़नफ़र'
आँखों को तो ये आलम-ए-हैरत भी बहुत है