उर्दू शायरी · ग़ज़ल

barsat ki jhaDiyon ko tum KHud hi mana lena

बरसात की झड़ियों को तुम ख़ुद ही मना लेना

برسات کی جھڑیوں کو تم خود ہی منا لینا

शायर: Yasmin Sahba7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बरसात की झड़ियों को तुम ख़ुद ही मना लेना
जब कुछ न समझ आए फिर हम को बुला लेना

इक मौज मचल कर जब साहिल से लिपटती हो
तुम तिश्ना निगाहों को दरिया पे जमा लेना

ऐ चारागरो तुम भी इस ग़म में रहो शामिल
दुखते हुए ज़ख़्मों का तुम भी तो मज़ा लेना

सोचों में ख़यालों में महकार सी भर देना
आँखों ने जो देखे हैं वो ख़्वाब चुरा लेना

लिक्खे हैं हवाओं पर जो गीत जुदाई में
उन को कभी चाहत से होंटों पे सजा लेना

जो मन में दहकती है दिन रात सुलगती है
उस आग को जज़्बों की रिम-झिम से बुझा लेना

क्यों ढूँडते फिरते हो 'सहबा' की वफ़ाओं को
महके हुए झोंकों को सीने से लगा लेना