उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bar-e-digar ye falsafe dekhun

बार-ए-दीगर ये फ़लसफ़े देखूँ

بار دیگر یہ فلسفے دیکھوں

शायर: Bakul Dev9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बार-ए-दीगर ये फ़लसफ़े देखूँ
ज़ख़्म फिर से हरे-भरे देखूँ

ये बसीरत 'अजब बसीरत है
आइनों में भी आइने देखूँ

ज़ावियों से अगर नजात मिले
सारे मंज़र घुले-मिले देखूँ

नज़्म करना है बे-हिसाबी को
लफ़्ज़ सारे नपे-तुले देखूँ

आख़िर आख़िर जो दास्ताँ न बने
अव्वल अव्वल वो वाक़िए देखूँ

दूरियाँ धुंद बन के बिखरी हैं
कुछ क़रीब आ कि फ़ासले देखूँ

एक नश्शा है ख़ुद-नुमाई भी
जो ये उतरे तो फिर तुझे देखूँ

ले गया वो बची-खुची नींदें
ख़्वाब कैसे रहे-सहे देखूँ

रात फैली हुई है मीलों तक
क्या चराग़ों के दाएरे देखूँ