उर्दू शायरी · ग़ज़ल

arz jo kuchh meri zabani hai

'अर्ज़ जो कुछ मेरी ज़बानी है

عرض جو کچھ میری زبانی ہے

शायर: Jalal Kakvi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'अर्ज़ जो कुछ मेरी ज़बानी है
आप-बीती नहीं कहानी है

जिस ने मुँह मदरसे का देख लिया
ज़िंदगी में वो आँ-जहानी है

राह मकतब की भूलने के लिए
ख़ाक इक इक गली की छानी है

पढ़ने लिखने में जी नहीं लगता
मार खाने की ये निशानी है

ख़ाक पढ़िए जो हो ग़िज़ा ऐसी
भात कंकर है दाल पानी है

जौर-ए-उस्ताद है न महर-ए-पिदर
किस क़यामत की ये गिरानी है

हर जुमा गुड-फ्राइडे है मिरा
रात भी उस की क्या सुहानी है

पार हूँ इम्तिहाँ के दरिया से
नाव काग़ज़ की यूँ चलानी है

फिर भला हम कहाँ कहाँ मस्जिद
ये नमाज़ अपनी इम्तिहानी है

ये ग़ज़ल ख़ूब है 'जलाल' मियाँ
क्या सलासत है क्या रवानी है

लखनवी ये जलाल गरचे नहीं
काकवी ये जलाल-ए-सानी है