उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ai KHuda zabt ke zindan mein koi dar kar de

ऐ ख़ुदा ज़ब्त के ज़िंदाँ में कोई दर कर दे

اے خدا ضبط کے زنداں میں کوئی در کر دے

शायर: Zafar Ibn-e-Mateen6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ऐ ख़ुदा ज़ब्त के ज़िंदाँ में कोई दर कर दे
या उसे मोम बना या मुझे पत्थर कर दे

पर किए हैं जो अता ताक़त-ए-परवाज़ भी दे
या तो मैं खुल के उड़ूँ या मुझे बे-पर कर दे

साज़िशें करते हैं क्यूँ अपने घराने वाले
घर दिया है तो मिरे घर को मिरा घर कर दे

मुझ से ये कर्ब का आलम नहीं देखा जाता
हाफ़िज़ा छीन ले आँखें मिरी पत्थर कर दे

मिरे हिस्से का सकूँ बाँट दे इंसानों में
दर्द-ए-सर सारे ज़माने का मिरे सर कर दे

मुझ को इंसान उतारा है तो इंसान बना
बे-ज़री मेरा मुक़द्दर है तो बू-ज़र कर दे