उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ai be-dilo harif-e-shab-e-tar kyun hue

ऐ बे-दिलो हरीफ़-ए-शब-ए-तार क्यूँ हुए

اے بے دلو حریف شب تار کیوں ہوئے

शायर: Parvez Shahidi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ऐ बे-दिलो हरीफ़-ए-शब-ए-तार क्यूँ हुए
कच्ची अगर थी नींद तो बेदार क्यूँ हुए

सहरा को आज कोसती फिरती हैं आँधियाँ
दीवाने गुलसिताँ के तरफ़-दार क्यूँ हुए

सुस्त-ए'तिबारियों को नहीं ताब-ए-इंतिज़ार
वा'दे सहर के सर्फ़-ए-शब-ए-तार क्यूँ हुए

शरमा गया चमन में तबस्सुम बहार का
हम गुल-फ़रोश ज़ख़्म-ए-दिल-ए-ज़ार क्यूँ हुए

क्या गुलसिताँ में थी सफ़र-आमादा बू-ए-गुल
झोंके हवा के क़ाफ़िला-सालार क्यूँ हुए

ऐ ज़िंदगी नक़ाब उलट कर जवाब दे
फ़न हम से पूछता है कि फ़नकार क्यूँ हुए